रविवार, जनवरी 01, 2012

रेतघड़ी



दिन बुरे नहीं थे जब पानी और सूरज घरो की छ्प्परें लाँघ जाते थे,
जब हवा भी बिन पूछे दरवाजा धेलकर अंदर आ जाती थी,
जब दिन की शुरूवात पंछियों के चहचाहट और रातें जुगनुओं की रौशनी से भरी होती थी,
जब सारा दिन यूँ ही दोस्तों के साथ और रातें हसीं ख्वाबो में काट दिया जाता था,
जब बारिश में खिड़कीयों के कांच पर उंगली से सन्देशे लिखे जाते थे,
जब हवाई जहाज की आवाज सुन छतों की ओर बेलगाम भागा करते थे,
जब कंचो,मीठी गोलियों, पतंगों का कुशल व्यापारी की तरह सौदा किया जाता था,
जब कब कहाँ आँख लग जाए पता नहीं चलता था,

दिन बुरे नहीं थे जब पानी और सूरज घरो की छ्प्परें लाँघ जाते थे,
काश कोई उल्टा सकता वक्त को रेतघड़ी की तरह |

4 टिप्‍पणियां:

  1. tab aur ab..
    jiwan ki beeti ghatiyon aksar yaad aakar man ko kured deti hain.. tab ahsas nahi hota hai ki aage kya hoga..
    bahut badiya prastuti..
    bahut achha laga aapke blog par aakar..
    NAVVARSH kee haardik shubhkamnayon sahit...

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  2. kaash!!
    but beeta waqt laut k nahi aata aur na hi wo pal :)
    aapki ek khasiyat hai ki bahut kam shabdon me bahut zyada keh jate hain.......It's really very beautiful :)

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मेरे ब्लॉग पर आ कर अपना बहुमूल्य समय देने का बहुत बहुत धन्यवाद ..